Sat. Jan 22nd, 2022
aurangabad
Aurangabad

Aurangabad भारत के महत्वपूर्ण राज्य Maharastra का महत्वपूर्ण शहर हे। इस शहर में घूमने के लिए कई पर्यटन स्थल मौजूद हे जो पर्यटक को अपनी और आकर्षित करने के लिए काफी हे। यहाँ पुरे साल हजारो पर्यटक आते हे और इस शहर को और भी ज्यादा समृद्ध बनाते हे। खासकर विश्व धरोहल स्थल में शामिल अजंता-इलोरा की गुफा के कारण यहाँ बहुत सारे विदेशी पर्यटक भी आते हे।

मध्यकाल में Aurangabad भारत के महत्वपूर्ण स्थानों में से एक था। औरंगज़ेब ने अपने जीवन का ज्यादार हिस्सा यही पर बिताया था। और यही पर उसकी मृत्यु हुई थी। औरंगजेब के बीवी का मकबरा भी यही स्थित हे जो की ताज महल से प्रेरणा लेकर बनाया गया हे। इसी लिए इसे “पश्चिम का ताजमहल” भी कहते हे।

दक्कन ट्रैप की पहाड़ी के ऊपरी इलाके में स्थित Aurangabad अपनी ऐतिहासिक विरासतों और रोमाचिंत जगहों के लिए जगविख्यात हे। Aurangabad 1,175,116 की आबादी के साथ महाराष्ट्र का पांचवां सबसे अधिक आबादी वाला शहर है।

Aurangabad में देखने लायक कई जगह मौजूद हे जैसे की अजंता इलोरा की गुफाए, औरंगाबाद गुफा, दौलताबाद किला,ग्रिश्नेश्वर मंदिर,जमा मस्जिद,बीबी का मक़बर,हिमायत बैग,सलीम ज़िल और भी कई जगह कई जगह हे जो औरंगाबाद के टूरिस्ट अट्रैक्शन हे।

औरंगाबाद इतिहास – Aurangabad History

Aurangabad शहर बहुत प्राचीन शहर हे। Aurangabad का इतिहास दूसरी सताब्दी से मिलता हे। जब सातवाहन शाशको ने प्रतिष्ठानपुर में अपनी राजधानी की स्थापना की जिसे आज पेठन के नाम से जाना जाता हे। इसी समय के आसपास अजंता की गुफाओ से मठो को उकेरा गया था।

और इस गुफा में शानदार चित्र बनाए गए थे। जो चित्र 19 वीं शताब्दी की शरुआत में आते आते खो गए थे। लेकिन बाद में फिर से इन्हे खोजै गया था। इलोरा गुफा की नक्कासी पाचवीं और दसवीं शताब्दी के बिच में की गई थी। यह नक्कासी तीन प्रमुख धर्मो को दर्शाती हिन्दू,जैन और बौद्ध।

खड़की इस जगह का मूल नाम था जिसे अहमदनगर के सुल्तान मुर्तजा निजाम शाह के वजीर मालिक अमबर ने राजधानी बनाया था। एक दशक के भीतर खड़की ज्यादा आबादी वाला और भव्य शहर में तब्दील हो गया था। लेकिन 1626 में मालिक अम्बर की मृत्यु हो गई।

इसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र को उत्तराधिकारी बनाया गया। जिसने खड़की का नाम बदलकर दौलताबाद रख दिया था। साल 1633 में मुघलो के शाही सैनिको द्वारा दौलताबाद किले पर हमला हुआ इस किले को चारो और से घर लिया और इसे अपने कब्जे में ले लिया। दौलताबाद सहित समग्र निजाम शाही के प्रभुत्व वाली जगह मुगलो के कब्जे में आ गई।

1653 में जब औरंगजेब दूसरी बार दक्कन का वायसराय बना तो उसने फतेहनगर को अपनी राजधानी बनाई और इसका नाम बदल कर Aurangabad कर दिया। इस शहर को उसके शाशनकाल में “खुजिस्ता बुन्याद” भी कहा जाता था।

1724 में आसफ ज़ाह जो एक तुर्क जनरल और मुगलो के निजाम अल मुल्क थे। उसने अनक़रीब ख़त्म होने वाले मुग़ल साम्राज्य से अलग होने का फैसला किया और दक्कन में अपने स्वयं के राजवंश की स्थापना की। बाद में उसके पुत्र निजाम अली खान आसफ जाह ने 1763 में अपनी राजधानी औरंगाबाद से हैदराबाद स्थानांतरित करदी।

1795 में जब मराठा और अली खान आसफ जाह के बिच युद्ध हुआ तो मराठा की जित हुई और Aurangabad मराठा के अधीन आ गया। हैदराबाद के निजाम को मराठाओ को क्षतिपूर्ति के लिए 30 मिलियन रूपये देने पड़े। लेकिन यहाँ पर मराठा राज केवल आठ साल तक ही चला था। द्रितीय एंग्लो-मराठा युद्ध में ब्रिटिश विजय के बाद यह शहर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के संरक्षण में आ गया।

जब तक भारत को आजादी नहीं मिली थी तब तक यानि 1947 तक Aurangabad ब्रिटिश राज के दौरान हैदराबाद रियासत का एक हिस्सा था। उसके बाद भी यह शहर 1956 तक हैदराबाद राज्य का हिस्सा था। 1956 में नवगठित बॉम्बे राज्य में औरंगाबाद को शामिल किया गया। और बाद में जब गुजरात और महाराष्ट्र को अलग किया गया 1960 में तब से औरंगाबाद शहर महाराष्ट्र का एक महत्वपूर्ण शहर हे।

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औरंगाबाद में घूमने की जगह – places to visit in aurangabad

अजंता की गुफाएँ – Ajanta caves

अजंता की गुफाए महाराष्ट्र में स्थित हे जो की Aurangabad से थोड़ी ही दूर हे। यह गुफाए बड़े बड़े पत्थर की चट्टानों को काट कर उसमे नक्कासी कर के बनाई गई हे। यह गुफाए दूसरी इसा पूर्व की शताब्दी में बनाया गया था ऐसा इतिहासकरो का मानना हे। इस गुफा में बौद्ध धर्म से जुडी अदभुत मुर्तिया और उत्कृस्ट चित्रकला की गई हे।

यह गुफाई महाराष्ट्र के Aurangabad जिले मे स्थित है. जो अजंता नाम के गांव के पास बनी हुई है. अजंता की गुफाओ को 1983 मे युनेस्को द्वारा विश्व धरोहल स्थल घोषित किया था.

आपको जानकार आश्चर्य होगा की अजंता के दो गुफाओ का नहीं पुरी तीस गुफाओ का समूह है. जिसकी बनावट घोड़े की नाल जैसी है. इस गुफा के पास ही एक नदी बहती है जिसका नाम वाघोरा नदी है. इन गुफाओ मे आपको बौद्ध धर्म से जुडी कई प्रतिमा और दीवारों पर बौद्ध धर्म से जुड़े चित्र देखने को मिलेंगे. इस गुफा मे भगवान बुद्ध के पिछले जन्मो के बारे मे भी कई चित्रण दर्शाए गए है.

यह गुफाई सहयाद्री की पहाड़ी पर स्थित है. इन 30 गुफाओ मे से लगभग 25 बौद्ध मठ है और 5 प्रार्थना भवन के रूप मे बनाए गई है. इन गुफाओ की खोज 1819 मे आर्मी ऑफिसर जोन स्मिथ और उसके दल द्वारा की गई थी. यह ऑफिसर यहाँ शिकार करने आये थे और अचानक उनकी नजर 29 गुफाओ की श्रुखला नजर आई और तब से यह गुफा प्रसिद्ध हो गई. इन गुफाओ मे दो संप्रदाय की झलक मिलती है एक बौद्ध धर्म और दूसरा महायान धर्म.

एलोरा की गुफाएं – Elora caves

एलोरा भारत के पुरातत्विक स्थालो मे से एक स्थल है. जो Aurangabad से 30 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है. इन गुफाओ को राष्ट्रकूट वंश के राजाओ द्वारा बनाया गया था तब इसका नाम वेरठ था. अपनी इस अदभुत गुफाओ के कारण एलोरा को युनेस्को द्वारा विश्व धरोहल स्थल घोषित किया है.

अजंता और एलोरा की गुफाए best aurangabad tourist places की लिस्ट में सबसे ऊपर आती हे।

एलोरा की गुफाई बौद्ध, जैन और हिन्दू धर्म को समर्पित है. जिसका निर्माण पांचवी और दशमी शताब्दी मे किया गया था. इस गुफाओ के समूह मे 5 जैन गुफाई, 17 हिन्दू गुफाई और 12 बौद्ध गुफाई बनाई गई है.

एलोरा मे कुल 34 गुफाई बनाए गई है. इन गुफाओ का निर्माण बेसल्टीक की पहाड़िओ के पास किया गया है.

औरंगाबाद गुफाएं – aurangabad caves

Aurangabad की इन गुफाओ के बारे में इतिहास में बहुत कम बाते मिलती हे क्युकी दूसरी गुफाओ में हमें शिलालेख देखने को मिलते हे लेकिन इन गुफाओ में ऐसे कोई भी शिलालेख मौजूद नहीं हे।

कई इतिहासकारो का मानना हे की इसका निर्माण छट्ठी और सातवीं शताब्दी में हुआ था। इन गुफाओ का इतिहास हमें पहेली बार कन्हेरी गुफाओ से मिलता हे। जो महाराष्ट्र की एक रॉक-कट गुफाओ का समूह हे। यह गुफा भारत की उन गिनी चुनी गुफाओ में से एक हे जहा आप पहेली शताब्दी की बौद्ध कलाकृति देख सकते हे।

यह गुफाएं कुल 12 गुफाओं का समूह है। इन गुफाओं को तीन भागो में बाटा गया हे। पहले समूह में 1 से 5 गुफाए हे जो की पश्चिमी समूह में शामिल हे जबकि दूसरे समूह में 6 से 9 गुफा हे जो पूर्वी समूह में सामेल हे। तीसरे समूह में 10,11 और 12 गुफा मौजूद हे जो उत्तरी समूह हे।

बीबी का मकबरा – Bibi Ka makbara

1668 में बनाया गया यह मकबरा बीबी का मकबरा और राबिया दुर्रानी का मकबरा के नाम से जाना जाता हे। इस मकबरे का निर्माण औरंगजेब के बेटे आजम शाह ने अपनी माँ दिलरस बेगम की याद में बनवाया था। दिलरस बेगम को उनकी मृत्यु के बाद राबिया दुर्रानी का नाम दिया गया था।

इस मकबरे की बनावट ताजमहल की बनावट को ध्यान रख कर बनाई गई हे। इसी लिए बीबी के मकबरे को दक्षिण का ताज भी कहा जाता हे। मुगलो द्वार उत्तर भारत में कई भव्य इमारतों का निर्माण हुआ लेकिन दक्षिण में बीबी का मकबरा अकेला दक्षिण में मुगलो का बनाया गया भव्य स्मारक हे। इसी लिए आज यह महाराष्ट्र के सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्मारकों में से एक है।

राबिया दुर्रानी यानि दिलरस बेगम को दी जाने वाली इस उपाधि का श्रेय एक ईरानी महिला राबिआ बसरा को दिए जाता हे। जो अपनी उदारता के लिए बहुत ही मशहूर थी। इस मकबरे के निर्माण के लिए जयपुर की संगेमरमर की खदानों से लाया गया था। इस मकबरे के निर्माण की कुल लागत 6-7 लाख रुपये आकि गई हे। ऐसा माना जाता हे की इस मकबरे के निर्माण के लिए पत्थर को बैलो से खींची जाने वाली गाड़िओ माँ लाया गया था।

घृष्णेश्वर मंदिर – Grishneshwar Temple

भगवान शिव को समर्पित ग्रिशनेश्वर मंदिर भारत के सबसे पवित्र हिन्दू तीर्थ स्थलों में से एक हे। औरंगाबाद शहर से लगभग 35 किलोमीटर दूर और एलोरा गुफा से केवल 2 किलोमीटर ही दूर यह मंदिर स्थित हे। इस मंदिर में 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक और आखरी ज्योतिर्लिंग मौजूद हे। यह मंदिर बहुत प्राचीन मंदिर हे जिसका उल्लेख हमें शिव पुराण मे से मिलता हे।

माना जाता है कि मंदिर, जिसे १३वीं शताब्दी में बनाया गया था मुगलों के शासनकाल के दौरान बार-बार नष्ट और पुनर्निर्माण किया गया था। और १८वीं शताब्दी में अपने वर्तमान स्वरूप में इसका पुनर्निर्माण किया गया था। आज मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में बल्कि महाराष्ट्र के aurangabad tourism में एक प्रमुख आकर्षण के रूप में भी कार्य करता है, खासकर एलोरा गुफाओं में आने वाले पर्यटकों के लिए।

दौलताबाद किला – Daulatabad Fort

दौलताबाद किला औरंगाबाद में एक पहाड़ी के ऊपर स्थित एक मजबूत गढ़ है, जो इसकी रणनीतिक स्थिति, अविश्वसनीय वास्तुकला और तीन-परत रक्षा प्रणाली के लिए इसे मध्यकालीन काल के सबसे शक्तिशाली पहाड़ी किलों में से एक बना दिया।

यह किला अलग अलग समय पर अलग अलग साम्राज्य के हस्तक रहा जिसमे यादव वंश, दिल्ली सल्तनत और अहमदनगर सल्तनत के अधीन रहा हे। आज यह किला औरंगाबाद के प्रमुख पर्यटक हे।

दौलताबाद किले के निर्माण का श्रेय पहले यादव राजा भीलमा को दिया जाता है, जिन्होंने इसे 1187 ईस्वी के आसपास बनवाया था। उन्होंने साइट के चारों ओर एक टाउनशिप भी स्थापित की और इसे अपनी राजधानी बनाया। उस समय इसे देवगिरी के नाम से जाना जाता था, जिसका अर्थ है देवताओं की पहाड़ी। यह 1296 ई. तक यादवों की राजधानी रही। बाद में, किला दक्कन पर शासन करने वाले कई राजवंशों के कब्जे में आ गया।

खिलजी वंश के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली सल्तनत पर अपने शासनकाल के दौरान 1308 में किले पर कब्जा कर लिया था। 1327 में जब यह सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के नियंत्रण में आया, तो उसने इसका नाम दौलताबाद रखा। उन्होंने अपनी राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित कर दिया और दिल्ली के लोगो को बड़े पैमाने पर यह आने का आदेश दिया। लेकिन 1334 में उन्होंने अपनी राजधानी को वापस दिल्ली स्थानांतरित कर दिया।

इसके कुछ ही समय बाद यह किला बहमनियों के अधीन आ गया। जिन्होंने देश के प्रसिद्ध मीनारों में से एक चांद मीनार सहित कई संरचनाओं को इस किले में बनवाया । बाद में 1499 में इसे अहमदनगर के निज़ाम शाहियों के हाथों में सौंप दिया गया जिन्होंने इस किले की संरचना को और भी ज्यादा मजबूत किया। मुगलों ने 17 वीं शताब्दी में किले पर कब्जा कर लिया और अगली कुछ शताब्दियों में इस किले पर मराठों, पेशवाओं, और अंत में हैदराबाद के निजामों सहित कई राजवंश ने अपना कब्ज़ा किया था। जिन्होंने इसे भारत में शामिल करने तक अपने नियंत्रण में रखा था।

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