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dwarka
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Dwarka एक पौराणिक शहर हे। जो की गुजरात के उत्तर-पश्चिम में स्थित हे। Dwarka शहर गोमती नदीं के किनारे पर बसा हुआ शहर हे। भगवान Shree Krishna की कर्मभूमि यानि द्वारका प्राचीनकाल से अबतक कई बार जीर्णोद्वार हुई हे। साल 2013 में Dwarka को एक अलग जिला घोसित किया गया और इसका नाम देवभूमि द्वारका रखा गया।

Dwarka भारत के सबसे महत्वपूर्ण हिन्दू तीर्थ स्थलों में से एक हे। अगर आप पौराणिक हिन्दू कथाओ को जानते हे तो आपको Dwarka और कृष्ण के बारे में पता ही होगा।

Dwarka कृष्ण के पौराणिक शहर का हिस्सा था। हिन्दू धर्म में कुल 12 ज्योतिर्लिंग हे उसमे से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर Dwarka में स्थित हे, इसी वजह से हिन्दू मान्यता की दृष्टि से Dwarka महत्वपूर्ण हे। पुरे साल हजारो लोग यहाँ पर आते हे और इस प्राचीन नगरी में श्री कृष्णा के दर्शन करते हे।

Dwarka हिन्दूओ के चार धाम में से एक धाम हे और भारत के सात सबसे प्राचीन शहरों में से एक हे। द्वारकाधीश मंदिर पांच मंजिला हे जो की बहुत ही सुन्दर और आकर्षित कलाकृति के साथ बना हुआ हे। यह मंदिर 60 खंभो पर बना हुआ हे जिसमे स्वर्गद्वार से प्रवेश किया जाता हे और मोक्ष द्वारसे मंदिर के बहार निकल सकते हे।

द्वारका का इतिहास – dwarika History

dwarika का अर्थ संस्कृत में स्वर्ग का द्वार होता हे। भगवान श्री कृष्णा ने अपने मामा यानि मथुरा के अत्याचारी राजा कंस का वध किया था। इसी कारन कंस के ससुर यानि मगधनरेश जरासंघ ने कृष्ण से बदला लेने के लिए यादवो पर बार बार आक्रमण किये। ऐसे लगातार आक्रमणों से बचाव के लिए और व्रजभूमि की रक्षा के लिए श्री कृष्ण ने नयी जगह जाके बसने का निर्णय लिया।

और उन्होंने कुशस्थली को पसंद किया। कुशस्थली में आने से पहले श्री कृष्ण ने कुशादित्य,कर्णादित्य ,सर्वादित्य और गृहादित्य नामके अशुरों का वध किया था। और फिर उन्होंने द्वारका द्वारका का निर्माण करवाया।

श्रीमद भागवत के मुताबिक Dwarka के निर्माण से पहले भगवान श्री कृष्ण ने सागर देव को 12 योजन भूमि मांगी ताकि वह Dwarka का निर्माण कर सके। समुद्र देव ने उन्हें वह जगह प्रदान की। उसके बाद श्री कृष्णा आदेश पर विश्वकर्माजी ने वहाँ पर Dwarka का निर्माण किया।

श्री कृष्णा ने द्वारका को बसा कर उसे अपना मुख्य केंद्र बनाया था। श्री कृष्ण के जीवन की कई महत्वपूर्ण घटनाए Dwarka में ही हुई थी जैसे की रुक्मणीहरण और विवाह, जांबवती,रोहिणी,सत्यभामा,कालिंदी,मिगविन्दा,सत्या,नाग्नजिती,लक्ष्मणा,दता,सुशल्या वगेरे के साथ विवाह,नर्कासुरवध,प्राज्ञोतिषपुरविजय,पारिजातहरण,बाणासुरविजय,महाभारत युद्ध सञ्चालन,द्रौपदी चीरहरण रक्षा, शिशुपाल वध जैसे अनेको घटनाए द्वारका में उनके स्थाई होने के बाद ही हुई थी।

भगवान श्री कृष्ण के समय में द्वारका समृद्धि के सिखर पर थी। लेकिन यादवो के भोग-विलास में दुब जाने से कई घटना ए हुई जैसे की यादवो ने अपने कई ऋषि-मुनि को परेशान और प्रताड़ित किया जिससे की ऋषिओ ने यादवो को श्राप दिया। ऋषिओ के श्राप से श्रापित यादवो का नाश होता गया और भगवान श्री कृष्ण ने अपनी लीला समेट ली।

श्री कृष्ण ने द्वारका में आने वाले संकट को देख लिया था इसी लिए वो यादवो को लेकर प्रभासक्षेत्र यानि अभी का सोमनाथ में बसने चले गए। दूसरी और श्री कृष्ण के द्वारका को छोड़ ने के बाद समुद्र का पानी पुरे द्वारका में फेल गया मनो समुद्र देव ने दी हुई भूमि श्री कृष्ण के जाने के बाद वापस ले ली हो और पूरा द्वारका शहर पानी में डूब गया।

समय गुजरने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण के पोते वृजनाभ को शूरसेन देश का राजा घोसित किया। जब वृजनाभ बड़े हुए तब वह द्वारका आये और श्री कृष्ण की स्मृति में एक सुन्दर और विशाल मंदिर बनवाया जो की आज का विद्यमान जगमंदिर द्वारका हे।

समुद्र के निचे द्वारका – dwaraka under sea

ऐसा माना जाता हे की कृष्ण के मृत्यु के बाद द्वारका पानी में दुब गई थी। और ऐसा भी कहा जाता हे की इस शहर का निर्माण 6 बार किया गया था अभी जो द्वारका शहर हे वो सतमी बार बसा हुआ शहर हे। पुराणी द्वारका अभी की द्वारका नगरी के निचे स्थित हे। पुराणी द्वारका उत्तर में बेट द्वारका और दक्षिण में ओखमढ़ी और पूर्व में अभी के द्वारका तक फैली हुई थी। ऐसी मान्यताओं को समर्थन देने वाले कई पुरातत्वीय संकेत वह से मिले हे।

एसएसआई द्वारा द्वारका के समुद्रीतट पर से किये गए अध्ययन से यहाँ पर प्राचीन शहर के होने के साबुत मिलते हे। विलुप्त शहर की खोज 1930 से चल रही हे। 1983 से 1990 के बिच में किये गई खोद काम से यहाँ पर छे सेक्टर में बानी टाउनशीप मिली थी और उसके साथ ही आधे माइल से ज्यादा लम्बाई वाली किले की दीवार भी मिली थी।

द्वारका का महत्व

द्वारका एक पौराणिक और हिन्दू ओ का महत्वपूर्ण स्थान। द्वारका यानि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किये गए चार धामों में से एक धाम। भगवान श्री कृष्णा जिन्हे वहाँकी प्रादेशिक भासा में कालिया ठाकर के नाम से जाना जाता हे ये उनका गांव हे। जहा के कण-कण में श्याम का निवास हे। यहाँ पर साल में हजारो भक्तो का आना जाना लगा रहता हे जो उन्हें प्रेम से याद करते हे। द्वारका को भगवान श्री कृष्ण की कर्मभूमि से जाना जाता हे।

अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची अवन्तिका।

पूरी धारामती चैव सप्तिका मोक्षाराचिका।

अर्थात अयोध्या, मथुरा, मायानगरी, कशी, पूरी, धारामती ऐ सात नगरी मोक्ष आपनारी छे।

द्वारका धार्मिक और आध्यात्मिक द्रष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण हे, क्युकी ये हिन्दू धर्म के चार सबसे महत्वपूर्ण स्थानों में से एक स्थान हे। देवभूमि द्वारका जिले में स्थित द्वारका एक बड़ा शहर हे। यहाँ पर हिन्दू धर्म के छोटे बड़े कई मंदिर मौजूद हे। गोमती नदी के किनारे बसा यह शहर हिन्दू धर्म का एक पवित्र तीर्थ स्थल हे। द्वारका के साथ एक बहुत बड़ा रहष्य जुड़ा हुआ हे। कहा जाता हे की भगवान श्री कृष्णा के यहाँ से जाने के बाद द्वारका नगरी समुद्र में दुब गई थी और आज भी यहाँ के समुद्र में पुरानी द्वारका नगरी के अवशेष पाए जाते हे।

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द्वारका मे देखने लायक जगह

द्वारका मे ऐसी कई जगह हे जहा आप घूमने जा सकते हे जिसमे धार्मिक और मनोरंजक दोनों स्थलों का समावेश होता हे।

जगतमंदिर – dwarka temple

द्वारका जिसके लिए प्रसिद्ध हे वो भगवान श्री कृष्ण का Dwarkadhis का dwarka temple जो की जगतमंदिर के नाम से प्रसिद्ध हे। यह भव्य मंदिर 5 मंजिला ऊँचा हे। यह मंदिर अपनी अदभुत और आकर्षित नक्काशी के लिए भी प्रसिद्ध हे। द्वारकाधीश मंदिर में कुल 60 स्तंभ हे जो की मंदिर को मजबूती देते हे। इस मंदिर में द्वार और बहार निकलने के लिए अलग द्वार की सुविधा हे। प्रवेशद्वारको स्वर्गद्वार और बहार निकलने वाले द्वार को मोक्षद्वार से जाना जाता हे।

भारतीय पुरातत्व खाते के मुताबिक द्वारकाधीश मंदिर अंदाजन 1200 साल पुराना मंदिर हे। एक और तर्क के हिसाब से 1400 साल पहले भगवान श्री कृष्ण के पोते व्रजनाभ ने इसे स्थापित किया था।

जगमंदिर द्वारका में द्वारकाधीश की मूर्ति काले पत्थर से बनी हे जो की दो फुट ऊँची हे। इस मूर्ति में भगवन ने अपने चार हाथो में शंख,चक्र,गदा और पद्म धारण किया हुआ हे। ऐसा माना जाता हे की विदेशी आक्रमणकारिओं से बचाने के लिए प्राचीन मूर्ति को द्वारका के सावित्री नाम के कुवे में रखा गया था। और इस दौरान वल्लभचार्य जी ने लाडवा गाम से दूसरी मूर्ति लेक मंदिर में रखी थी। द्वारका मा द्वारकाधीश मंदिर के अलावा तक़रीबन 24 और प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण मंदिर हे।

गोमती घाट

गोमती नदी का घाट यानि गोमती घाट। द्वारकाधीश मंदिर इसी गोमती नदी के किनारे पर स्थित हे। गोमती घाट की 56 सिडिया हे जिसे चढ़ के आप द्वारकाधीश मंदिर के स्वर्गद्वार में प्रवेश कर सकते हे। गोमती नदी के सामने पंचानंदतीर्थ हे। इस स्थान की खूबी यह हे की इसके चारो और खारा समुद्र हे फिर भी इसके पांचो कुए में मीठा पानी हे। इस कुओ को पांडवो द्वारा बनाया गया हे ऐसा उल्लेख मिलता हे। गोमती नदी जहा समुद्र से मिलती हे वहां संगमनारायण मंदिर हे। इस स्थान के पास चक्राकिंत शिलाऐ मिलती हे। विष्णुपुराण के मुताबिक भगवान विष्णु ने अशुरों का नाश करके अपने सुदर्शनचक्र इसी स्थान पर पानी में डाल कर साफ़ किया था।

गोमती कुंड

द्वारकाधीश मंदिर की दक्षिण की और एक बड़ा तालाब हे जो गोमती तालाब के नाम से जाना जाता हे। जिसका एक अलग ही धार्मिक महत्व हे गोमती कुंड के ऊपर निष्पाप कुंड हे। इस कुंड में उतर ने के लिए सीडीओ की व्यवस्था हे। निष्पापकुण्ड में पितृतपर्ण और पिंडदान का विशेष महत्त्व हे। गोमती कुंड से थोड़ी ही दुरी पर कैलाश कुंड हे। कैलाश कुंड की खासियत ये हे की इसका पानी गुलाबी रंग का हे। यहाँ पर एक और तालाब हे जिसको से जाना जाता हे। गोपी तालाब की आसपास की मिटटी पिले रंग की हे। इस मिटटी को गोपी चन्दन कहते हे। इस मिट्टी का प्रयोग सुंदरता को बढ़ाने के लिए किया जाता हे।

बेट द्वारका

जो कोई भक्त द्वारका जाता हे उसकी यह मान्यता होती हे की बेट द्वारका गए बगैर द्वारका की यात्रा अधूरी हे। बेट द्वारका ही वह जगह हे जहा पर श्री कृष्ण ने नरसिंह महेता की हुंडई स्वीकार की थी। बेट द्वारका में पांच भव्य महल हे। इसमें सबसे प्रथम महल श्री कृष्ण का हे जो की बाकि के महल से अच्छा और भव्य हे। उसकी उत्तर में रुक्मणि और राधा महल हे और दक्षिण में सत्यभामा और जाम्ब्वती महल आया हे। यह पांचो महल बहुत ही सुन्दर हे। यहाँ पर रणछोड़रायतीर्थ में रणछोड़रेजी की मूर्ति के रूप में द्वारकाधीश बिराजमान हे।

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6 thoughts on “Dwarka History : wonderful places to visit in dwarka [2021]”
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