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Nalanda Vishwavidyalaya
Nalanda Vishwavidyalaya

Nalanda Vishwavidyalaya Overview

nalanda vishwavidyalaya भारत के प्राचीन राज्य मगध (हाल का बिहार) में एक प्रसिद्ध बौद्ध विश्वविद्यालय था। पाली भाषा शिक्षा की मुख्य भाषा थी। यह यहाँ के कई विभिन्न बौद्ध ग्रंथों से पता चलता है। ये ग्रंथ इसे एक मठ और एक श्रद्धेय बौद्ध मठ के रूप में दर्शाते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय ने प्राचीन काल में काफी प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा प्राप्त की और चौथी शताब्दी के आसपास भारत को एक महान शक्ति के रूप में उभरने में इसके योगदान के कारण अपनी अलग ही पौराणिक जगह प्राप्त की।

नालंदा पटना से लगभग 95 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है। यह स्थल पाँचवीं शताब्दी CE से 1200 CE तक दुनिया में सीखने के सबसे बड़े केंद्रों में से एक था। आज यह यूनेस्को की विश्व धरोहर सूचि में सामेल है।

एशिया में आजसे तक़रीबन दो से ढाई हजार साल पहले सिर्फ तीन ही विश्वविद्यालय हुआ करते थे और वो तीनो अखंड भारत का हिस्सा थे। तक्षशीला विश्वविद्यालय ,नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय । जिनमे से हाल के समय में नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय भारत में मौजूद हे और तक्षशिला पाकिस्तान बनने के बाद वह का हिस्सा हे।

कई ऐतिहासिक स्रोतों से हमें ये संकेत मिलता हे की नालंदा विश्वविद्यालय का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और लंबा इतिहास रहा हे। यह इतिहास पांचवी शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी तक लगभग 800 सालो तक चला। नालंदा विश्वविद्यालय में एक अनुमान के हिसाब से एक ही साथ 10000 छात्र शिक्षा ले सकते थे और उन दस हजार छात्रों को पढ़ाने के लिए यहाँ 2000 शिक्षक मौजूद थे। आज नालंदा का यह विश्व विख्यात विद्यालय खंडर की हालत में पड़ा हे लेकिन वह अपने स्थापत्य तत्वों के माध्यम से पूरी प्रकृति को ज्ञान से प्रकट कर रही हे। नालंदा विश्वविद्यालय मनुष्य और प्रकृति के बिच एक सह-अस्तित्व का प्रतिक मना जाता हे।

नालंदा नाम की उतपत्ति के बारे में कई तथ्य मौजूद हैं । तांग राजवंश के एक चीनी तीर्थयात्री जुआन झांग के अनुसार नालंदा ना अल और लल्लम दा से आता है, जिसका अर्थ है कि उपहार या दान का कोई अंत नहीं है। एक अन्य चीनी यात्री यिजिंग के मुताबिक नागा नंदा से आता है जो स्थानीय टैंक में नाग (नागा) नाम को संदर्भित करता है। खंडहरों की खुदाई का नेतृत्व करने वाले पुरातत्वविद् हीरानंद शास्त्री नालंदा को नल (कमल-डंठल) की प्रचुरता का नाम देते हैं और मानते हैं कि नालंदा के बाद कमल-तना दाता का प्रतिनिधित्व करेगा।

कुछ तिब्बती स्रोतों में नालंदा को नालेंद्र कहा जाता है, जिसमें तारनाथ का काम भी शामिल है।

नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास – History of Nalanda University in Hindi

नालंदा शुरुआत में राजगृह के पास में (आधुनिक राजगीर) से गुजरने वाले एक प्रमुख व्यापार मार्ग से एक समृद्ध गांव था जो उस समय मगध की राजधानी था । ऐसा कहा जाता है कि जयतीर्थंकर महावीर ने नालंदा में 14 बरसात के दिन बिताए थे।

कहा जाता है कि गौतम बुद्ध ने पवारिका के पास कैरिना गांव में व्याख्यान दिया था और उनके दो मुख्य शिष्यों में से एक शारिपुत्र का जन्म इसी क्षेत्र में हुआ था और बाद में उन्होंने वहां निर्वाण प्राप्त किया। महावीर और बुद्ध के साथ यह पारंपरिक संबंध कम से कम ५वीं से ६वीं शताब्दी ईसा पूर्व का है।

हाल की पुरातात्विक खोजों ने नालंदा के इतिहास को 1200 ईसा पूर्व वापस धकेल दिया है। मिट्टी की ईंट का स्तूप ६ठी से ५वीं शताब्दी ईसा पूर्व का कार्बन भी है जो नालंदा को उसके प्रारंभिक काल से एक महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल के रूप में मजबूत करता है।

नालंदा के बारे में कई सदियों से हो रही रिसर्च से भी ज्यादा जानकारी नहीं मिली हे । १७वीं शताब्दी के तिब्बती लामा कहते हैं कि तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य और बौद्ध सम्राट अशोक ने नालंदा में शारिपुत्र चैत्य के स्थान पर एक महान मंदिर का निर्माण किया था। वह तीसरी शताब्दी के महायान दार्शनिक नागार्जुन और उनके शिष्य आर्यदेव को नायलैंड में संस्थान के प्रमुख के रूप में रखता है।

तारनाथ ने सुविष्णु नामक नागार्जुन के समकक्ष का भी उल्लेख किया है जिन्होंने इस स्थान पर 108 मंदिरों का निर्माण किया था। जब भारत के एक प्रारंभिक चीनी बौद्ध तीर्थयात्री फेक्सियन ने 5वीं शताब्दी के मोड़ पर शारिपुत्र के परिनिर्वाण के स्थान नालो का दौरा किया, तो उन्होंने जो उल्लेख किया वह एक स्तूप का ​था

नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास बहुत सुनहरा हे। पौराणिक समय में यह विश्वविद्यालय एक बौद्ध विश्वविद्यालय था। जो यहाँ का सबसे बड़ा शिक्षा का केंद्र था। सातसौ से ज्यादा साल तक यहाँ पर बौद्ध धर्म दर्शन और अन्य महत्वपूर्ण विषयो की शिक्षा दी जाती थी।

यह एशिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में सामेल था इसी लिए इस विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए देश-विदेश से कई छात्र आते थे जिनमे से ज्यादातर चीन,जापान,मंगोलिया,तिब्बत,कोरिया और श्रीलंका के छात्र ज्यादा थे। चीन के जाने माने यात्री हवांग यांग ने भी नालंदा विश्वविद्यालय में पांच साल तक कठोर शिक्षा ली थी।

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नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना – Establishment of Nalanda University

वैसे तो इस विश्वविद्यालय की स्थापना का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता लेकिन इतिहासकारो के हिसाब से इस जगह पर महान सम्राट अशोक ने मंदिर की स्थापना की थी इसी लिए सम्राट अशोक को ही नालंदा विहार का संस्थापक माना जाता हे।

कई इतिहासकारो की माने तो इसकी स्थापना गुप्त वंश के शाशको द्वारा की गई थी जिनमे से मुख्य नाम कुमारगुप्त और समुद्रगुप्त का नाम मिलता हे। इसके प्रमाण भी यहाँ पर मिले हे यहाँ की खुदाई के दरमियान सम्राट समुद्रगुप्त के समय का एक पुराना तमालपत्र और कुमारगुप्त के समय का एक सिक्का मिला था।

कन्नौज के राजा हर्षवर्धन के शाशनकाल के दौरान नालंदा में मानो धन की बरसात हुई हो राजा हर्षवर्धन ने अपने शाशनकाल के दौरान बहुत नालंदा को बहुत धन दिया था। राजा हर्षवर्धन ने अपने राज्य के 100 गांव की महसूल से आने वाली आय नालंदा विश्वविद्यालय के नाम कर दी थी। इस आय से विद्यार्थीओ को भोजन मुफ्त में मिलने लगा इसी लिए उन्हें भिक्षा मांगने के लिए नहीं जाना पडता था।

कुछ लोकमत के हिसाब से सम्राट अशोक ने अपने साम्राज्य के 1200 गांव की आय इस विश्वविद्यालय को चलाने के लिए दे दी थी। उस समय आने वाले किसी भी विद्यार्थी को शिक्षा के लिए कोई भी फीस नहीं भरनी पड़ती थी साथ ही उनको खाना पीना भी यहाँ मुफ्त में मुहैया कराया जाता था।

एक चीनी यात्री जो की यहाँ का विद्यार्थी भी रह चूका हे उसके मुताबिक यहाँ पर शिक्षा कर रहे छात्रों को अपना पेट भरने के लिए भिक्षा नहीं मागणी पड़ती थी।

नालंदा विश्वविद्यालय की वास्तुकला – Nalanda University of Architecture

नालंदा विश्व विद्यालय तीन मिल छोड़ी और सात मिल लम्बी भूमि में बनाया गया था। लेकिन अभी तक सिर्फ एक वर्ग मिल में ही इसकी खुदाई की गई हे। जिनमे से इस विद्यालय के दो भाग मिले। जिनमे से एक लाइन में हॉस्टल और कॉलेज मिले और दूसरी लाइन में बुद्ध मंदिर और 11 बौद्ध विहार मिले जिन्हे ग्यारह ब्लॉक भी कहा जाता हे।

यह विद्यालय तीन मंजिला ईमारत थी। अभी हाल में दिख रहा ढांचा तीसरा माला हे बाकि के दो मंजिल जमीन में गड़ी हुई हे। कहा जाता हे की इसकी पहेली मंजिल गुप्तकाल की हे। दूसरी मंजिल राजा हर्षवर्धन ने बनवाई थी और तीसरी मंजिल का निर्माण देवपाल ने करवाया था।

यहाँ के हर एक ब्लॉक में एक हॉल हे जो माना जाता हे की लेक्चर हॉल होगा। जहा आचार्य पढ़ते थे। इस हॉल में एक ब्लैक बोर्ड भी था और साथ ही साथ हॉल में ही एक कुआ था। इस हॉल के कमरे थे जहा छात्र और आचार्य रहते थे। यह विद्यालय रहने की सहूलियत के साथ बनाया गया था। कमरों हॉल के चारो तरफ बरामदा था जिसमे बाथरूम,रोशनदान और चबूतरे भी बनाए गए थे।

दूसरे पर्यटक आकर्षण – other tourist attractions In Nalanda

स्तूप – stupa

नालंदा में भगवन बुद्ध के प्रथम शिष्यों में से एक सारिपुत्र की समाधी मिली हे। बुद्ध के इस शिष्य की मृत्यु यही हुई थी जहा पर उनका स्तूप बना हे। यह स्तूप नालंदा का सबसे बड़ा और ऊँचा स्तूप हे। इतिहासकारो से पता चला हे की यह स्तूप तक़रीबन ढाई हजार साल पुराना हे। इस स्तूप को सात बार नष्ट किया और इसे सात बार बनाया गया। लेकिन हमारे पास इसके तीन बार बनने के ही प्रमाण मौजूद हे। बाकि के स्तूप जमीन में दबे हुए हे।

अभी जो हमें बहार से दिख रहा हे वह स्तूप 1500 साल पुराना हे। पहेली बार इसको पांचवी शताब्दी में कुमारगुप्त ने बनवाया था। बाहरी स्तूप में धनुष का चिह्न और उसके चारो और मुर्तिआ बनाई गई हे। यहाँ मिले प्रमाणों से यहाँ पर तीन बार स्तूप बनने के प्रमाण हे जिसमे पहले की ऊपर दूसरा और दूसरे की ऊपर तीसरा ऐसे बनाया गया हे।

कुमारगुप्त के बनाए गए स्तूप के ऊपर राजा हर्षवर्धन ने सातवीं शताब्दी में एक स्तूप बनाया और हर्षवर्धन के बनाए गए स्तूप पर बंगाल के राजा देवपाल ने नौवीं शताब्दी में एक स्तूप बनाया जो की हाल में मौजूद हे। इतिहासकारो के मुताबिक इन तीनो स्तूपों के निचे सम्राट अशोक का बनाया गया स्तूप हे।

बौद्ध मंदिर – Buddhist temple

नालंदा की खुदाई के दौरान यहाँ पर कई छोटे बड़े बौद्ध मंदिर मिले हे जो की खंडर हालत में मौजूद हे। उनमे से अभी तक सुरक्षित और प्रमुख तीन मंदिर हाल में भी मौजूद हे। यहाँ पर एक के ऊपर एक ऐसे सात मंदिर हे जिनमे से निचे के दो मंदिर जमीन में दबे हुए हे और बाकि के देखे देते हे। चार मंदिरो के आलावा पांचवा मंदिर सबसे प्रमुख और अभी तक सुरक्षित हे। इस विद्यालय में जितने भी बौद्ध मंदिर मिले हे उनके पास छोटे बड़े स्तूप बनाए गए हे। माना जाता हे की विद्यालय में मरने वाले आचार्य और छात्रों को राख के ऊपर ये स्तूप बनाए गए हे।

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